पंजाब की सरदारनियां-1 (Punjab ki sardarniyan-1)

यह कहानी चूंकि पंजाब में घटित घटनाओं पर आधारित है, तो इसलिए इसमें कहीं-कहीं पर पंजाबी भाषा की छाप भी देखने को मिलेगी। तो बिना आपका समय गंवाए मैं कहानी शुरू करती हूं।

कहानी शुरू होती है पंजाब के मालवा क्षेत्र से जिसमें एक जिला है,‌”फरीदकोट”। फरीदकोट के नजदीक एक गांव लाखिया कोट ( बदला हुआ नाम) में रहता एक ज़मीदारों का परिवार, जिनके पास 15 एकड़ जमीन है।

घर में सरदार बलवंत सिंह 55 साल की उम्र में भी खेतीबाड़ी करते है। 3-4 बार गांव की पंचायत में मेंबर और साथ ग्रामीण सोसाइटी के प्रधान के पद पर रहने की वज़ह से गांव में उनका काफी रसूख था। कमी तो बस एक जब शराब दिखती तो फिर काबू ना रख पाते और इतनी पीते सुध-बुद्ध खो बैठते।

सरदारनी राजवंत कौर, 48 साल, गोरा रंग 5’8″ की कद काठी के साथ 73 किलो भार। एक भरे जिस्म की मालकिन पंजाबन जो हमेशा अपने बाजुओं में चूड़ियां और पैरों में पायल पहने रखती थी।

बेटी जस्मीन कौर, 26 की, गोरे रंग की मालिक जिसने अपनी जवानी में पैर रख दिया था, पर अब तक कोई भी भौंरा इस फूल का रस नहीं चख पाया था।

5’7″ कद और 68 किलो भार के सुडौल भरे बदन की मालकिन जस्मीन को देख कर मुर्दे भी उठ खड़े होते थे। डिग्री करने के बाद अब जस्मीन किसी नौकरी की तलाश में थीं।

हरनूर सिंह, 19 साल का बेटा, जो अभी 12th में पढ़ रहा था, और साथ ही खेती-बाड़ी में भी पिता के साथ हाथ बंटाया करता।

मार्च महीने की एक सुबह 11-11:15 बजे फोन की रिंग बजती है, तो उसे जस्मीन उठाती हुई कान से लगाती है.

“हैलो”।

“हैलो जी, जस्मीन जी से बात हो रही है मेरी?”

सामने से एक फीमेल की आवाज़ आई।

“जी बोल रही हां, आप कौन?”

“जस्मीन जी मैं ICEI बैंक से बात कर रहीं हां, तुसी जॉब के लिए आवेदन दिया सी?”

“हां जी मैंने किया सी, काफी समय हो गया।”

“हां, तो आप अपना रेज़्यूमे और डॉक्यूमेंट लेके आ सकती है अभी?”

“अभी, हांजी मैं आ जाती हूं।”

“ठीक है, आ जाइए”, कहते हुए बैंक कर्मचारी ने फोन रख दिया।

जस्मीन जल्दी से तैयार होने लग गई। नहाई तो सुबह थी ही, पर गर्मी के कारण एक बार फिर जल्दी से नहा कर लाइट गुलाबी रंग का कमीज़ पलाज़ो पहन कर तैयार हो गई।

“किथे (कहां) जा रही‌ है जस्मीन”, राजवंत  जस्मीन को तैयार होते देख पूछने लगी।

“मम्मी बैंक वाले का फोन सी, मेरी इंटरव्यू है आज नौकरी दे लिए”, जैस्मीन ने कमर तक आते काले बालों की पोनी करते हुए कहा, और फिर सिर पर चुन्नी लेके अपने डॉक्यूमेंट उठा कर स्कूटी पर जाने के लिए तैयार थी।

“बाबा फरीद माथा टेक के जाना जाती होई”, राजवंत ने जस्मीन को कहा।

जस्मीन ने हां में सिर हिला के ज़वाब दिया और चल पड़ी।

मां के कहे मुताबिक बाबा फरीद माथा टेक जस्मीन ICEI बैंक के बाहर स्कूटी पार्क करके अंदर चली गई।

पहले ही काउन्टर पर बैठी एक फीमेल कर्मचारी से पूछ कर वो बैंक मैनेजर के रूम की तरफ चली गई।

“में आई कम इन सर”, जस्मीन ने दरवाजा खोलते हुए पूछा।

जस्मीन की आवाज़ सुन कर बैंक मैनेजर ने दरवाजे की तरफ देखा तो जैसे वह सुन्न सा हो गया।

संतोष लाल, 40 साल, काला रंग, 5’9” कद, 83 किलो भार के साथ पेट थोड़ा बाहर को निकला हुआ बैंक मैनेजर। संतोष लाल का अपनी पत्नी के साथ तलाक हो चुका था, और फिर उसने शादी नहीं की, और ना ही करने जरुरत पड़ी। उत्तर प्रदेश का रहने वाला था, पर हाल ही में उसकी बदली पंजाब में की गयी थी। पहले भी वो पंजाब में रह चुका था, और यहां पर हर तरह का स्वाद वो ले चुका था।

“हां-हां, आ जाओ”, संतोष लाल अपने हाथ में ली फाइल टेबल पर रख कर जस्मीन को आते हुए देखने लगा।

जस्मीन ने अपने डॉक्यूमेंट टेबल पर रखे, और संतोष के इशारा करने पर कुर्सी पर बैठ गयी।

अब तक जस्मीन का रेज़्यूमे संतोष के हाथो में था, और वो उसे बस ऐसे ही देख रहा था। नज़रे तो उसकी कहीं और ही थी।

“तो जस्मीन कौर, आप ग्रेजुएट है, और मैथ्स के साथ, वाह! मतलब आपका हिसाब-किताब अच्छा है”, संतोष ने रेज़्यूमे एक तरफ करके पूछा।

“हां सर, मेरा मतलब मेरी स्कूल मेडम ने मुझे इसके लिए उत्साहित किया”, जस्मीन ने हिचकिचाती हुई ने जवाब दिया।

“आहा’, वो मुझे इस फोरम को हल करके दीजिए तांकि मैं भी जान सकू आपके मैथ्स को”,‌ संतोष एक पेपर जस्मीन के आगे रखा, और खुद उठ कर टहलने लगा

कुछ देर बाद जस्मीन ने पेपर हल करके संतोष को दिया ,

“हो गया सर।”

संतोष अपनी कुर्सी पर बैठ कर उसे चेक करने लगा,

“एह आपके कुछ है तुक जवाब ठीक है और कुछ गलत।”

संतोष जस्मीन को देख कर बोला, “अच्छा मुझे बताओ कि बैंक में एक खाता धारक अपने खातों को किन विभिन्न तरीकों से संचालित कर सकता हैं?”

जस्मीन कुछ सोचने के बाद जवान देने के लिए बोली, “सर एक खाता धारक अपने बैंक खाते को अलग तरीकों से चला सकता है जैसे इन्टरनेट बैंकिंग, टेलीफोन या मोबाइल बैंकिंग, शाखा या काउंटर पर सेवा, एटीएम,‌ डिजिटल रूप से जैसे फोन पे, गूगल पे।”

“हम्म, और आपके पिता जी के भाई का क्या कारोबार है”, संतोष लाल कुर्सी पर बैठा अपने शरीर को एक अंगड़ाई के साथ रिलैक्स करता हुआ बोला।

“सर पापा खेती करते है और भाई छोटा है, अभी 12 में पढ़ाई कर रहा है, कभी-कभार पापा की मदद करवा देता है।”,‌ जस्मीन ने संतोष लाल की तरफ देख कर जवाब दिया।

संतोष जवाब सुन कर कुछ देर तक जस्मीन को देखता रहा। जस्मीन भी ऐसे में थोड़ी घबरा गई, के शायद वो रिजेक्ट कर दी जाएगी।

“खेतीबाड़ी, तो भैंसे भी होगी, डेली आते हुए लस्सी और दही लेके आया करना, और हां कल से जॉइन करो”, संतोष ने मुस्कराहट के साथ कहा, और साथ ही एक कर्मचारी को बुला कर उसे हेड ब्रांच में मेल करके जस्मीन का ज्वाइनिंग लेटर के लिए कहा।

जस्मीन भी मुस्करा कर संतोष को धन्यवाद कहती हुई उस कर्मचारी के साथ जाने लगी, तो संतोष की नजरें अभी चलते समय उपर-नीचे उछल रहे जस्मीन के उभारों पर थी।

ज्वाइनिंग लेटर मिलने के बाद तो जैसे जस्मीन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। बैंक से निकलने के बाद एक बार फिर से जस्मीन बाबा फरीद जी के गुरुद्वारे माथा टेक और घर वालों के लिए मिठाई का डिब्बा लेकर जाती है।

सब इस बात से खुश होते है, के जस्मीन को नौकरी मिल गई थी, और दूसरे दिन से ही वह बैंक में जाने लगी।

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